नमस्कार, मित्रों!
मैं अनुराग त्रिपाठी एक बार फिर आप सभी का स्वागत करता हूं।हम अब इस कड़ी को एक नए अध्याय के रूप में शुरू करेंगे, जिसका नाम है विशुद्ध ज्ञान।
#The_AB_Tripathi
आज के इस संस्करण में मै आप सभी को एक प्रेरणादायक उद्धरण सुनाना चाहता हूं। आप को ये कहानी कैसी लगती है, अपने अनमोल विचार एवं सुझाव हमें अवश्य दें।
तो चलिए कहानी शुरू करते हैं -
एक बार की बात है एक सुंदर से उपवन में एक अत्यंत ही सुन्दर चिड़िया एक वृक्ष की शाखा पर बैठी थी। उस उपवन में विचरण कर रहे एक युवक की दृष्टि उस चिड़िया पर पड़ी। इतनी दिव्य चिड़िया को देखकर वह युवक दबे पांव उसके पीछे गया और उसे अपने हाथों में लेकर घर की तरफ चल दिया।
तभी उस चिड़िया ने उस युवक के सामने एक प्रस्ताव रखा कि यदि वह उसे मुक्त कर दे तो वह उसे तीन दिव्य सुझाव रूपी रत्न प्रदान करेगी। इतना सुनकर उस युवक ने उस चिड़िया को मुक्त कर दिया।
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चिड़िया ने जैसे ही उड़ान भरी, उसने उस युवक को अपना प्रथम उपदेश इस प्रकार दिया।
चिड़िया ने कहा - हे मानव! जीवन में जो बुरा या अच्छा वक्त बीत गया, कभी भी उसको लेकर चिंतित ना होना। जो घटित होना था वह तो हो गया अब अपने वर्तमान पर ध्यान दो, इस प्रकार ही तुम चिंता मुक्त जीवन व्यतीत कर सकते हो।
युवक ने आदर भाव से कहा - मैं जीवन में इस बात का ध्यान रखूंगा। आप अब मुझे दूसरी सलाह दे।
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चिड़िया ने कहा दूसरी सलाह इस प्रकार है सुनो - कोई कुछ भी कहे या बताए उस पर यूं ही विश्वास ना करना, उससे उसके वक्तव्य के पीछे का ठोस आधार अवश्य जानना चाहिए, यदि वह ऐसा करने में असमर्थता जाहिर करता है, तो स्वयं के स्तर पर उस तथ्य की जांच अवश्य करें। अन्धविश्वास तथा मिथ्या कथन से बचें।
युवक ने चिड़िया से कहा मुझे शीघ्ातिशीघ्र तीसरा रत्न रूपी उपदेश भी बता दें, ताकि मैं यहां से प्रस्थान कर सकूं।
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चिड़िया ने कहा - मैंने तुझे मूर्ख बनाया है, मेरे शरीर में ही तीन दिव्य रत्न विद्यमान हैं, यदि तो मुझे मूर्खतावश ना छोड़ता तो तू स्वतः इन रत्नों का स्वामी बन जाता।
इतना सुनते ही वह युवक क्रोध एवं पश्चाताप से भर गया और बोला मैं कितना मूर्ख हूं हो मैंने तुम्हारी बात मानकर तुम्हे छोड़ दिया, अब यदि तुम्हारे पास कहने के लिए कुछ शेष हो तो कहो।
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चिड़िया बोली - तुमने अभी अभी मेरे द्वारा दिए गए दो उपदेशों को भुला कर दूसरे की असम्भव व अप्राकृतिक बात पर विश्वास भी कर लिया, और अपने किए कर्म पर शोक भी व्यक्त कर लिया। तुमने कितनी आसानी से मान लिया कि मेरे इतने छोटे से शरीर में तीन दिव्य रत्न छुपे हो सकते हैं। अतः तुमने मेरे द्वारा दिए गए ज्ञान को पूरा जाने बिना ही आगे का ज्ञान लेने की इच्छा प्रकट कर दी। मेरी तीसरी सलाह इस संबंध में ही है।
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मेरी तीसरी सलाह कहती है कि प्रत्येक प्राणी को सबसे पहले ये प्रयास करना चाहिए कि जिस ज्ञान को वह पहले से ही हासिल कर चुका है, दूसरे विषय में अध्ययन करने से पूर्व वह उस ज्ञान को ही वह परिपूर्णता तक ले जाए। ऐसा करने से उसे अपने विषय में महारत हासिल हो जाएगी, तथा वह अन्य लोगों को बेहतर तरीके से उस विषय के संबंध में जानकारी उपलब्ध करा पाएगा।
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आपको ये कहानी कैसी लगी मुझे अवश्य बताइएगा।धन्यवाद्।अनुराग त्रिपाठी#The_AB_Tripathi#विशुद्ध_ज्ञान#VishuddhGyan
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